पंचवटी की समकालीन प्रासंगिकता
DOI:
https://doi.org/10.67715/ijerast.v1i3.14Keywords:
प्रासंगिकता, खण्डकाव्य, देश की रक्षा, कर्तव्यनिष्ठता, एकपत्नीत्व, पुरूष, समाज, अंगहीन और अनैतिक व्यवहार।Abstract
अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि और आलोचक मैथ्यु आर्नल्ड ने साहित्य के प्रति उपयोगितावादी दृष्टिकोण अपनाकर साहित्य को समाज का दर्पण अर्थात् Literature is the mirror of society कहा था। साहित्य मनोरंजन का साधन न होकर मानव समाज के विभिन्न प्रश्नों, समस्याओं को इस कार प्रस्तुत किया करता है जिस से जीवन-समाज का मार्गदर्शन तो हुआ ही करता है, उस का भीतरी और बाहरी स्वरूप भी उभर कर सबके सामने आ जाया करता है। इस दृष्टि से परखा जाए तो हिन्दी भक्ति साहित्य की देन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें रामायण या रामकथा पर आधारित साहित्य का उल्लेखनीय स्थान है। क्योंकि रामायण सर्वकालिक है अर्थात् भूत, वर्तमान एवं भविष्य के लिए यह अपनी प्रासंगिकता का छाप छोड रखा है। प्रमुखत: मैथिलीशरण गुप्त जी के पंचवटी खण्डकाव्य इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। रामायण मानव समाज के लिए एक प्रेरणा श्रोत है। अत: हिन्दी भक्ति साहित्य के दोहा एवं पदों को पाठ्क्रम के रूप में रखना अधिक प्रासंगिक ही है। इसके अभाव में विद्यार्थी जीवन-शिक्षा से अपरिचित रहेंगे और कुसंगत में पडकर पथभ्रष्ट हो जाने की संभावनाएँ अधिक हैं।
