डिजिटल डिवाइड का समाजशास्त्रीय अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.67715/ijerast.v1i5.29Keywords:
डिजिटल डिवाइड, सामाजिक असमानता, डिजिटल साक्षरता, डिजिटल बहिष्करण, सामाजिक समावेशन।Abstract
डिजिटल डिवाइड से आशय समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी तक पहुँच, उपयोग और उसके लाभ उठाने की असमानता से है। प्रस्तुत शोधपत्र का मुख्य उद्देश्य इस असमानता के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों का विश्लेषण करना है तथा यह समझना है कि डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता किस प्रकार सामाजिक संरचना को प्रभावित करती है। शोध में यह पाया गया कि डिजिटल डिवाइड केवल तकनीकी समस्या नहीं है बल्कि यह गहराई से सामाजिक असमानताओं से जुड़ी हुई है। समाज के उच्च वर्ग, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग तथा शिक्षित जनसंख्या डिजिटल तकनीकों तक अधिक पहुँच रखते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्र, निम्न आय वर्ग, महिलाएँ और हाशिए पर रहने वाले समुदाय इससे वंचित रह जाते हैं। इस प्रकार डिजिटल डिवाइड सामाजिक स्तरीकरण को और मजबूत करता है।
अध्ययन में यह भी स्पष्ट होता है कि शिक्षा डिजिटल असमानता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिन व्यक्तियों के पास उच्च शिक्षा और डिजिटल साक्षरता होती है वे इंटरनेट और अन्य तकनीकों का प्रभावी उपयोग कर पाते हैं। इसके विपरीत, अशिक्षा और तकनीकी ज्ञान की कमी डिजिटल बहिष्करण को बढ़ाती है। इसके अलावा, भाषा भी एक बाधा के रूप में सामने आती है क्योंकि अधिकांश डिजिटल सामग्री अंग्रेज़ी में उपलब्ध होती है जिससे स्थानीय भाषाओं के उपयोगकर्ता पीछे रह जाते हैं। प्रस्तुत शोधपत्र लैंगिक असमानता को भी रेखांकित करती है। कई समाजों में महिलाओं को तकनीकी संसाधनों तक कम पहुँच मिलती है जिससे उनका डिजिटल सशक्तिकरण बाधित होता है। यह स्थिति रोजगार, शिक्षा और सामाजिक भागीदारी में भी असमानता उत्पन्न करती है। आर्थिक दृष्टि से डिजिटल डिवाइड आय के अवसरों को भी प्रभावित करता है। जिन लोगों के पास डिजिटल साधनों की पहुँच है, वे ऑनलाइन शिक्षा, ई-व्यापार, और डिजिटल सेवाओं का लाभ उठाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं जबकि अन्य लोग इन अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इस प्रकार डिजिटल डिवाइड आर्थिक असमानता को और बढ़ा देता है।
शोध में यह भी सुझाव दिया गया है कि सरकार और नीतिनिर्माताओं को इस समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट सुविधाओं का विस्तार, सस्ती डिजिटल सेवाएँ, डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम और स्थानीय भाषाओं में सामग्री उपलब्ध कराना आवश्यक है। साथ ही, निजी क्षेत्र और सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है। अंततः शोधपत्र से स्पष्ट होता है कि डिजिटल डिवाइड एक बहुआयामी सामाजिक समस्या है जिसका समाधान केवल तकनीकी विकास से नहीं बल्कि समावेशी सामाजिक नीतियों और जागरूकता से संभव है। यदि इस असमानता को कम नहीं किया गया तो यह समाज में पहले से मौजूद विभाजनों को और गहरा कर सकती है। इसलिए डिजिटल समावेशन को सामाजिक न्याय और विकास के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में देखा जाना चाहिए।
