गंगा नदी के अपशिष्ट जल प्रबंधन के लिए किए गए विभिन्न उपायों का आलोचनात्मक विश्लेषण: उत्तर प्रदेश के विशेष संदर्भ में एक समीक्षा
DOI:
https://doi.org/10.67715/ijerast.v1i6.40Keywords:
गंगा नदी, अपशिष्ट जल प्रबंधन, नमामि गंगे, सीवेज उपचार संयंत्र, उत्तर प्रदेश, औद्योगिक प्रदूषण, जल-गुणवत्ता, नदी पुनर्जीवन।Abstract
गंगा नदी भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और पारिस्थितिक जीवन-रेखा है। इसके जल का उपयोग पेयजल, सिंचाई, मत्स्य पालन, औद्योगिक गतिविधियों, धार्मिक अनुष्ठानों और घरेलू आवश्यकताओं के लिए किया जाता है। तीव्र नगरीकरण, जनसंख्या वृद्धि, घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपवाह, ठोस अपशिष्ट तथा अपर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह के कारण गंगा नदी की जल-गुणवत्ता पर गंभीर दबाव उत्पन्न हुआ है। इस समस्या के समाधान के लिए गंगा एक्शन प्लान, नमामि गंगे कार्यक्रम, सीवेज उपचार संयंत्रों का निर्माण, नालों का अवरोधन एवं मोड़, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण, ग्रामीण स्वच्छता, जैव-उपचार, निर्मित आर्द्रभूमि तथा उपचारित जल के पुनः उपयोग जैसे अनेक उपाय किए गए हैं।
प्रस्तुत समीक्षा-पत्र का उद्देश्य वर्ष 2014 से 2026 तक गंगा नदी के अपशिष्ट जल प्रबंधन के लिए अपनाए गए विभिन्न उपायों का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है। अध्ययन में गंगा के पाँच प्रमुख राज्यों—उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल—को शामिल किया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश को विशेष अध्ययन क्षेत्र के रूप में केंद्र में रखा गया है। समीक्षा में सरकारी रिपोर्टों, वैज्ञानिक शोध-पत्रों, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संबंधित दस्तावेजों का विश्लेषण किया गया है।
उपलब्ध साहित्य से स्पष्ट होता है कि सीवेज उपचार क्षमता और प्रदूषण नियंत्रण अवसंरचना में वृद्धि हुई है, परंतु उपचार संयंत्रों का वास्तविक संचालन, सीवर कनेक्टिविटी, रखरखाव, विद्युत आपूर्ति, औद्योगिक अनुपालन, कीचड़ प्रबंधन और उपचारित जल के पुनः उपयोग से संबंधित समस्याएँ अभी भी विद्यमान हैं। अतः गंगा पुनर्जीवन के लिए केवल केंद्रीकृत सीवेज उपचार संयंत्रों पर निर्भर रहने के बजाय नदी-बेसिन आधारित, विकेन्द्रीकृत, पुनः उपयोग-केंद्रित, प्रकृति-आधारित और समुदाय-समर्थित अपशिष्ट जल प्रबंधन प्रणाली आवश्यक है।
